कम्पोस्ट (Compost)
कम्पोस्टिंग एक जैव रासायनिक क्रिया है जिसमें वायवीय (aerobic) तथा अवायवीय (anaerobic) जीवाणु कार्बनिक पदार्थों को विघटित कर बारीक खाद बनाते हैं यह पूर्ण सड़ा हुआ कार्बनिक पदार्थ ही कम्पोस्ट कहलाता हैं।
भारत में तैयार किया जाने वाला कम्पोस्ट इस प्रकार है -
1. फार्म अवशिष्टों से तैयार कम्पोस्ट - इसमें खरपतवार, फसल अवशेष, पशुओं का बचा हुआ चारा, पेड़-पौधों की पत्तियां आदि काम में लिये जातें हैं।
2. शहर व कस्बों के अवशिष्ट से तैयार कम्पोस्ट - यह शहर का मल, कूड़ा - करकट व अन्य कार्बनिक कचरा आदि से तैयार किया जाता है।
कम्पोस्ट बनाने की विधियां -
1. इन्दौर विधि
2. बैंगलोर विधि
3. नाडेप विधि
इनमें नाडेप विधि अच्छी है जिसका वर्णन यहां किया जा रहा है -
1. नाडेप कम्पोस्ट (Nadep compost) - यह विधि महाराष्ट्र के कृषक 'नाडेप काका' द्वारा विकसित की गई। इस विधि में निम्न सामग्री काम में ली जाती है -
(अ) फार्म अवशेष, अपशिष्ट, कम्पोस्ट बनाने के लिए आवश्यक सामग्री - कपास व अरहर के डंठल, गन्ने की पतियां आदि करीब 1400 - 1500 कि.ग्रा. ।
(ब) पशुओं का गोबर 90-100 कि.ग्रा.
(स) सूखी छनी मृदा 1750 कि.ग्रा.
(द) पानी मौसम के अनुसार
इस विधि में पशुओं के गोबर का कम प्रयोग किया जाता है। इस विधि में वायवीय प्रकिया द्वारा कार्बनिक पदार्थों का विघटन होता हैं। कम्पोस्ट तैयार होने में 90-120 दिन का समय लगता है। इस विधि से तैयार कम्पोस्ट में 0.5-1.5% नाइट्रोजन, 0.5-0.9% फास्फोरस व 1.2-1.4 % पोटेशियम पाया जाता है।
नाडेप कम्पोस्ट टैंक - ईंटें या पत्थर आदि से जमीन के ऊपर टेंक तैयार की जाती हैं। टेंक का आकार आयताकार जिसके अंदर लंबाई 10 फीट, चौड़ाई 6 फीट तथा ऊंचाई 3 फीट रखते हैं। सतह तक की दीवार 9 इंच मोटी होनी चाहिए। ईंटों की जुड़ाई मिट्टी से करते हैं सिर्फ टेंक की ऊपरी ईंटें सीमेंट से जोड़ते हैं जिससे टेंक के गिरने का डर न रहे। हवा के आवागमन के लिए टैंक की चारों दीवारों में 7 इंच चौड़े छेद छोड़ने चाहिए, ईंट की दो परत के बाद तीसरी परत को जोड़ते समय प्रत्येक ईंट की जुड़ाई के बाद 7 इंच का छेद छोड़कर जुड़ाई करते है इसी प्रकार तीसरी, छठी तथा नवीं परत में छेद रखतें हैं, यह छिद्र एकान्तर में छोड़े जाते हैं। एक के ऊपर दूसरा छिद्र न आये यह ध्यान रखना आवश्यक हैं। टैंक के अन्दर व बाहर की दीवारों और फर्श के टैंक भरने से पूर्व गोबर व मिट्टी के मिश्रण से भली प्रकार लीप देना चाहिए। टैंक सुखने के बाद ही प्रयोग में लायें।
टैंक भरने की विधि - टैंक भरने से पूर्व गोबर के घोल का छिड़काव टैंक के नीचे तथा दीवारों के अंदर कर लेना चाहिए। टैंक की भराई 48 घंटों में पूर्ण कर लेनी चाहिए अन्यथा कम्पोस्ट बनने की प्रक्रिया में बाधा आती हैं।
प्रथम परत (वानस्पतिक पदार्थ) - पहली 6 इंच की परत फार्म के वानस्पतिक अवशेषों से भर देनी चाहिए जो करीब 100 कि.ग्रा. होते हैं।
दूसरी परत (गोबर का घोल) - गोबर या गोबर की लेही (Slurry) ( करीब 4-5 कि.ग्रा. गोबर की सम्पूर्ण सामग्री 125-150 लीटर पानी में घोल ) का पहली परत पर एक सार छिड़काव करते हैं।
तीसरी परत (साफ सुखी छनी मिट्टी) - इस परत में 50-60 कि. ग्रा. (4-5 टोकरी) साफ सूखी छनी मिट्टी गोबर की परत पर एक सार बिछा देते हैं तथा इसके ऊपर पानी का छिड़काव कर गीला कर लेते हैं।
इस प्रकार के तीन क्रमों में टैंक में परत बनाते रहते हैं जब तक ढ़ेर टैंक की दीवारों से 1.5 फीट ऊपर तक न आ जाये। साधारणतया 11-12 तहों में टैंक भर जाता है। टैंक के ऊपरी भाग को झोपड़ीनुमा आकार देते हैं टैंक भरने के बाद ढक देते है तथा 3 इंच मोटी मिट्टी की परत (करीब 300-400 कि.ग्रा. मिट्टी ) की सहायता से अच्छी तरह बंद कर देते हैं इस बात का ध्यान रखें कि टैंक के ढेर में दरार न पड़े क्योंकि दरारों से गैस निकलती है, इसलिए इसके ऊपर पुनः लीपन करते रहें।
दुसरी भराई - 15-20 दिन बाद कूड़ा-करकट दब कर नीचे बैठ जाता है तथा टैंक करीब 8-9 इंच तक खाली हो जाता है तदुपान्त इसको उपरोक्त क्रमानुसार तीन परतों में भरकर गोबर व मिट्टी से लीप देना चाहिए। इस विधि से कम्पोस्ट तैयार होने में 3-4 माह का समय लगता है, कम्पोस्ट 15-20 प्रतिशत नमी बनाये रखने के लिए गोबर व पानी के मिश्रण का छिड़काव करें जिससे खाद में आवश्यक पोषक तत्व संरक्षित रह सकें। साधारणतया एक टैंक से 160-175 घन फीट कम्पोस्ट, जिसका वजन 3 टन के करीब होता है , प्राप्त होती है।
कम्पोस्ट प्रयोग विधि -
सामान्यतया फसलों में 10-15 टन प्रति हेक्टेयर व सब्जियों में 20-25 टन प्रति हेक्टेयर कम्पोस्ट की मात्रा को बुवाई के 3-4 सप्ताह पूर्व खेत में डालकर हल चलाकर मिट्टी में भली भांति मिला लेना चाहिए।


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