साइलेज बनाना (Silage making)
पशुओं के आहार में हरे चारे का एक विशिष्ट स्थान है। विशेषकर दूध देने वाले पशुओं के आहार में हरे चारे के उपयुक्त मात्रा होनी चाहिए ताकि उनका भोजन स्वादिष्ट और कोमल बना रहे, पशुपालकों के समक्ष यह समस्या प्रायः अधिक समय तक बनी रहती है कि पशुओं को पूरे वर्ष हरा चारा किस प्रकार उपलब्ध कराया जाए, क्योंकि गर्मी के दिनों में हरा चारा बहुत ही कम मिल पाता है साथ ही उसे उगाने में अधिक व्यय भी होता है। भारत में साइलेंज केवल मिलिट्री डेरी फार्म राजकीय फार्म अथवा किन्हीं एक दो व्यक्तिगत डेरी फार्म पर बनाया जाता है। एक औसत श्रेणी का पशुपालक भी चारों को सुरक्षित करके प्रयोग नहीं करता है इसके निम्नलिखित कारण है-
1. पशुपालकों को साइलेज के लाभों का ज्ञान नहीं है।
2. चारों की प्रायः कमी हर समय बनी रहती हैं।
3. मौसम भी प्रायः प्रतिकुल रहता है।
4. यहां का कृषक कृषि कार्य में अधिक व्यस्त रहता है।
साइलेज की परिभाषा हम इस प्रकार कर सकते हैं कि यह वह दबाया जा रहा है जिसमें हरे चारे के सभी तत्व मौजूद हो इसमें किसी प्रकार की सड़न अथवा बूरी गंध उत्पादित ना हुई हो तथा इसमें रसीलापन हो।
साइलेज बनाने की क्रिया को साइलोइंग अथवा इन्साइलिंग (Siloing or Ensiling) कहते हैं।
साइलेज बनाने के लाभ -
1. साइलेज के रूप में हरी फसलों को कोमल एवं रसीली अवस्था में काफी समय तक रखा जा सकता है तथा हरे चारे के अभाव में समय कम खर्च में साइलेज से वह कमी पूर्ण की जा सकती है।
2. साइलेज के रूप में फसलों को सुरक्षित करके किसी सीमा तक पोषक तत्वों की मात्रा को नष्ट हो जाने से बचाया जा सकता है क्योंकि भूसा या कड़वी बनाने से यह तत्व अधिक मात्रा में समाप्त हो जाते हैं।
3. वर्षा ऋतु में जब हरी फसलों या घासों से 'हे' बनाना कठिन होता हैं, साइलेज बनाया जा सकता है।
4. साइलेज के लिए कटी फसल के साथ खरपतवार भी काट लिए जाते हैं। खरपतवारो का विनाश स्वत: होता हैं।
5. किसी क्षेत्र की पक्की फसल को कड़वी के रूप में इकट्टा करने के लिए अधिक स्थान की आवश्यकता होती है जबकि साइलेज थोड़े स्थान में तैयार कर सुरक्षित रखा जा सकता है।
6. साइलेज के लिए फसल फूलने की अवस्था पर (flowering stage) में काट ली जाती हैं। अतः खेत आगे की फसल बोने के लिए शीघ्र तैयार हो जाता हैं।
7. फसल काट लेने से पहले काट लेने पर कीड़े - मकोड़े जो अभी अपनी पूर्ण अवस्था को नहीं प्राप्त हुए हैं, नष्ट हो जाते हैं।
8. साइलेज पशुओं को साल भर खिलाया जा सकता है। यह उत्तम गुणकारक होता है। पशु इसे चाव से खाते हैं।
9. फसलों को सुखाकर संग्रह करने से आग लग जाने या वर्षा से चढ़ने का भय बना रहता है परंतु साइलेज के संग्रह में ऐसी आपत्ति नहीं आती है।
जिन गड्ढों, नालियों अथवा बुर्ज में हरा चारा दबाकर भरा जाता है उन्हें साइलो कहते है। साइलो कई प्रकार के होते हैं। इनका चलन उस स्थान जलवायु कृषक की आर्थिक दशा तथा पानी के तल के ऊपर निर्भर रहते हैं।साइलो निम्न प्रकार के होते हैं-
1. साइलो बुर्ज (Silo tower) - जमीन के ऊपर बनायें जातें हैं।
2. साइलो खाई( Silo trench) - भूमि के नीचे बनाए जाते हैं।
3. साइलो गर्त (Silo pit) गोल या चौकोर गड्ढा होता है।
साइलो गर्त तथा खाई जमीन के नीचे तथा साइलो बुर्ज जमीन के ऊपर बनाएं जातें हैं। साइलो गर्त तथा खाइयाॅ कच्ची अथवा पक्की दोनों प्रकार की बनाई जाती हैं। भूमि के ऊपर बुर्ज, लकड़ी, ईंट व सीमेंट से बनायें जातें हैं। इसमें हवा का प्रवेश नहीं होना चाहिए। इसमें बीच-बीच में दरवाजे बनायें जातें हैं तथा ऊपर छप्पर बनाया जाता है।
भारतवर्ष में प्रायः भूमि के नीचे साइलो गर्त व खाइयाॅ बनाई जाती हैं। इसकी लम्बाई, चौड़ाई व गहराईं पशुओं की संख्या , खिलाने का समय एवं साइलेज की आवश्यक मात्रा के अनुसार रखा जाता है। गहराई उस स्थान के पानी के स्तर का ध्यान रखकर की जाती है जिन स्थानों पर पानी की बहुत कम गहराई पर ही होता है, वहां बुर्ज बनाए जाते हैं।
साइलो पिट प्रायः 8' × 5' × 4' के बनायें जातें हैं तथा साइलो बुर्ज 8'- 10' व्यास वालें 20' - 22' ऊंचे बनाएं जातें हैं खाइयाॅ प्रायः 8' गहरी 7'-8' चौड़ी बनाई जाती हैं।
साइलेज बनाने से पहले कुछ आवश्यक बातें -
1. साइलेज उन फसलों में उत्तम बनेगा चीन में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा अधिक होती है अन्यथा चारा सड़ जाएगा, जैसे - ज्वार मक्का,जई उत्तम है।
2. साइलेज बनाने वाली फसलों में शुष्क पदार्थ की मात्रा (D.M%) 30-40% से अधिक नहीं होनी चाहिए।
3. फसल को भरते समय खूब दबाया जाएं ताकि बीच में वायु न रहे अन्यथा फसल सड़ जायेंगी।4. जिन गड्ढों अथवा बुर्ज में फसल को दबाना है उनमें कही छेद न हों।
5. फसल में पर्याप्त नमी तथा कोमलता की भी आवश्यकता है।
अतः फसल फूलने की अवस्था में ही काट ली जाए।
गड्ढों का भरना ( Falling of silo pits ) - अपने देश में साइलेंज गड्ढों में ही बनाया जाता है । अतः गड्ढों का वर्षा से बचाव रखा जाता है । फसल को फूल आने की अवस्था में काटा जाता है। अधिक बढ़ जाने पर रेशा की मात्रा बढ़ जाती हैं । और पाचक तत्व घट जातें हैं।फसल को सुबह काटकर पूरे दिन खेत में छोड़ देते हैं ताकि नमी अधिक मात्रा में कम हो जाएं। फसल के गठ्ठर बनाकर इन्हें गड्ढे में बिछाया जाता है। सबसे नीचे कुछ घांस बिछा देते हैं। फसल को मशीन से काट काट कर भरना उत्तम रहता है।
गड्ढों में फसल फसल को भरते समय खूब दबाया जाता है ताकि बीच-बीच में हवा न रह जाए।
चारे को जमीन की सतह से 5' -6' ऊंचा भरना चाहिए, क्योंकि बाद में इसका स्तर कम हो जाता हैं अन्त में ऊपर से कुछ घांस डालकर इसे मिट्टी से लीपकर बंद कर दिया जाता है। जिससे कि कहीं से वायु एवं जल प्रवेश नहीं हो सकें।
जब हरी फसल को काटकर गड्ढों में दबाया जाता है तों पौधों की जीवित कोशिकाएं श्वासोच्छवास क्रिया करती हैं वे गड्ढे में आॅक्सीजन का प्रयोग कर कार्बन डाइऑक्साइड विसर्जित करती हैं। इस प्रकार 5 घंटे में जब ऑक्सीजन काम आ जाती है और गड्ढे में लगभग 70 से 80% कार्बन डाइऑक्साइड की उपस्थिति होने पर फफूंदी उत्पन्न नहीं होती है यदि गड्ढों अथवा बुर्ज में कईसे वायु प्रवेश कर जाती है तो फफूंदी उत्पन्न होकर चारा सड़ा देती है।
वायु की अनुपस्थिति में बढ़ने वाले जीवाणु (Anaerobic bac-teria) अपनी संख्या में बढ़ते हैं। यह पौधों में मौजूदा शर्करा (Carbohydrates) पर क्रिया कर कार्बनिक अम्ल मुख्यतः दुग्धाम्ल (Lactic acid) उत्पन्न करते हैं, इसके अतिरिक्त एसिटिक अम्ल व इथाइल एल्कोहल भी उत्पन्न होते हैं। इन अम्लों के उत्पन्न होने से सड़न पैदा करने वाले जीवाणु अपनी वृद्धि नहीं कर पाते हैं। जिन चारों में शर्करा कम होते हैं। उनमें अम्ल कम बनने से सड़न वाले जीवाणु अपनी वृद्धि नहीं कर जाते हैं।यदि शर्करा अधिक होता है तो साइलेज अधिक खट्टा बनता है। कुछ समय बाद इन अम्लों का बनना रुक जाता है क्योंकि अम्ल बनाने वाले शुक्राणु अधिक अम्ल बन जाने पर स्वयं वृद्धि करना बंद कर देते हैं। साइलेज में रासायनिक परिवर्तन बंद हो जाते हैं यदि इस समय भी हवा अंदर चली जाती है तो साइलेंज सड़ जाता है अन्यथा काफी समय तक सुरक्षित बना रहता है अम्ल का उत्पादन पौधों में शर्करा की मात्रा साइलेज बनाने के लिए उपयुक्त होती है।
साइलेज का वर्गीकरण (Classification of silage)- स्वाद के आधार पर निम्न वर्गीकरण किया जा सकता हैं -
(1.) मीठी साइलेज (Sweet Silage ) - इसमें दुग्धाम्ल की मात्रा अधिक होती है। यह लाभप्रद होता है तथा अम्लीय कम होता हैं।
(2.) अम्लीय साइलेज ( Acidic Silage ) - इसमें ऐसीटिक एसिड अधिक मात्रा में उत्पन्न होता है तथा दुग्धाम्ल की मात्रा कम होती है।
साइलेंट को रंग तथा स्वाद के आधार पर निम्न प्रकार वर्गीकृत किया जा सकता है-
1. बदामी गहरी, मीठी साइलेज
2. अम्लीय, कम बादामी वाली साइलेज
3. हरी साइलेज
4. अधिक खट्टी साइलेज
5. फफूंदी युक्त साइलेज



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