सनाय (Indian senna )

सामान्य नाम (Common name) - सोनामुखी, सनायमकी

वानस्पतिक नाम (Botanical name) : केसिया अंगस्टीफोलिया वहल (Casia angustifolia Vahl.) 

कुल (Family ): फैबेसी (Fabaceae)


सनाय (केसिया अंगस्टीफोलिया), कुल फैबेसी व उपकुल सिजलपिनाइडी का पौधा हैं। अरब और सोमालिया में सनाय (स्वर्ण पत्ती) के पौधे जंगली रूप में मिलते हैं। एक अन्य प्रजाति भारत में पाई जाती है। जिसका नाम है केसिया एक्यूटीफोलिया विभिन्न भाषाओं में इसके अलग-अलग नाम है, जैसे संस्कृत में मार्कण्डी मार्कण्डिका (अभिनव) हिंदी में सनाय, सनायमकी (मुखी), बंगाली में सोनामुखी, गुजराती में मीठी आवल सोनामुखी, कोंकणी में सेनामक्की, अंग्रेजी में इंडियन सेन्ना आदि।

दक्षिण भारत के तिन्नेवेली, मदुरई एवं त्रिचिरापल्ली आदि में बड़े पैमाने पर इसकी खेती की जाती है। तिन्नेवली में होने वाली सनाय अरबी की अपेक्षा श्रेष्ठ होती है। भारत में प्रतिवर्ष 20 करोड़ रुपए की सनाय की पत्तियों का निर्यात किया जाता है। राजस्थान के जोधपुर बाड़मेर जैसलमेर बीकानेर व नागौर जिलों की सुस्त जलवायु सनाय के लिए विश्व में सर्वाधिक उपयुक्त है।

औषधीय उपयोग (Medicinal uses) - सनाय मुख्यतः एक रेचक का कार्य करता है। इसकी पत्तियों एवं फलियों में सेनोसाइड पाए जाते हैं। जिनका उपयोग औषधि निर्माण के लिए किया जाता है। वर्तमान में अनेकों आयुर्वेदिक, एलोपैथिक, यूनानी एवं होम्योपैथिक औषधियों के निर्माता इसकी पत्तियों का उपयोग विभिन्न औषधियों के निर्माण हेतु कर रहे हैं। उदाहरण के लिए कई कब्जनाशक चूर्ण में सनाय की पत्तियां ही होती है। इस पौधे से प्राप्त रॉल (Resin) का 'इजिफल  असाकदुस' यूनानि दवा बनाने हेतु उपयोग किया जाता है। जिसका मस्तिष्क और पेट से लसीले पदार्थ निकालने के लिए उपयोग किया जाता है। इसके जूस व पाउडर को कैंसर व ट्यूमर के लिए उपयोग किया जाता है सनाय बीजों को अमलतास के साथ दही में पीसकर त्वचा पर उपस्थित रिंग वाॅर्म के उपचार हेतु उपयोग किया जाता है।

यद्यपि सनाय की पत्तियों का उपयोग प्रमुख पेट की बीमारियों से संबंधित औषध निर्माण के लिए किया जाता है परंतु इसके साथ-साथ अन्य रोगों की रोकथाम के लिए अन्य औषधियां भी बनाई जा रही है जैसे पीलिया, अस्थमा, मलेरिया बुखार, अपच आदि।

सनाय का सेवन करने के उपरांत 6 से 8 घंटे के अंदर रेचन की क्रिया पूरी हो जाती है। आदती कब्ज के रोगियों में कोष्ठ शुद्धि के लिए सनाय उपयुक्त औषध है। विकृत दोषों के निवारण के लिए यह एक उत्कृष्ट औषध है। इसी कारण तृतीयक चतुर्थिक आदि पर्यायज्वर, पितज एवं सोदाजन्य आमवात एवं कटिशूल, गंधसी,  वात रक्त एवं कुपचन के कारण मल शुद्धि ना होने से शरीर में मल संचय होने पर अमलताश आदि अन्य उपयुक्त औषधियों के साथ इसका सेवन करने से दूषित पित आदि और व्याधिजनक विषों का शरीर से निर्हरण होता है और नवीन शुद्ध पितादि उत्पन्न होते हैं और औसध अपना कार्य भली-भांति करती है।

शोषणोपरान्त सनाय का शरीर से निस्सरण मूत्र, स्तन्य आदि सभी शारीरिक स्त्रावो से होता हैं।। अतएव स्तनपान कराने वाली स्त्रियों में सनाय का सेवन करते समय इस बात का ध्यान रखना चाहिए क्योंकि माता के सनाय सेवन करने पर स्तनन्धय - शिशु पर भी उसका प्रभाव पड़ सकता है। ऐसे शिशुओं में रेचन कराने के लिए सनाय इस गुण का उपयोग भी किया जाता है।