मुर्गियों की चेचक (Fowl pox )

चेचक रोग सामान्यतः सभी आयु की मुर्गियों में प्राय गर्मियों में होता है । लेकिन अक्सर कम उम्र (8 से 12 सप्ताह ) के पक्षियों में यह रोग होता है। इससे पक्षी कमजोर हो जाते हैं और काफी पक्षी मर भी जाते हैं। जिन पक्षियों में यह रोग एक बार हो जाता है।उनमें अक्सर दोबारा यह चेचक रोग नहीं होता हैं। एक बार प्रारंभ हो जाने पर यह रोग तेजी से फैलता है। खासतौर से यह बीमारी मुर्गी एवं टर्की में होती है। लेकिन कबूतर, बत्तख, तीतर तथा बटेरो में भी चेचक रोग होता है।


कारक (Etiology) 

यह वायरस द्वारा फैलने वाला रोग हैं मुर्गियों में यह बोरेलिओटा एबियम (Borreliota avium) टर्की में बोरेलिओटा मेलिग्रेडिस (B. Meleagrdis) तथा कबूतर में बोरेलिओटा कोलुम्बी (B. Columbae) स्ट्रेन से फैलता है।



लक्षण (Symptoms) :- मुर्गियों में चेचक तीन प्रकार की होती है।

1. सुखी चेचक जिसे त्वचीय (Cutaneous) चेचक भी कहते हैं। इसमें कलंगी, गलचर्म तथा चेहरे पर सूखी पड़ी की तरह प्रकोप दिखाई देता है।


2. आर्द्र चेचक (wet pox )इसे डिप्थीरिया टाइप की चेचक कहते हैं मुख तथा ग्रासनली की म्यूकस झिल्ली (Mucus membrane )इसमें प्रभावित होती है।


3. तीसरी प्रकार की चर्चा में कोराइजा बीमारी के से लक्षण दिखाई देते हैं इसमें नासिका में संक्रमण होता है

उपरोक्त तीनों प्रकारों के सामूहिक लक्षण निम्न प्रकार दिखाई देते हैं।


1. पक्षी की कलंगी, चेहरे, चोंच, टांग, पलक तथा त्वचा पर छोटे-छोटे फफोले पड़ जाते हैं। जो शुरू में हल्के भूरे रंग के तथा बाद में गहरे भूरे रंग के होकर सूखने लगते हैं 3 - 4 सप्ताह बाद सूखी त्वचा शरीर से गिरने लगती है।

2. मुर्गियों में तेज बुखार हो जाता है।

3. श्वास नली में सूजन तथा इससे लसदार पदार्थ का स्त्राव होता हैं। 4. सिर में सुजन होती हैं। जिससे पक्षी मर जाते हैं। 

5. अति तीव्रता की स्थिति में आंख, मुंह तथा गले मे हल्के पीले रंग की झिल्ली पड़ जाती हैं। जिसके नीचे छोटी-छोटी दानेनुमा रचना दिखायी देती हैं।


उपचार (Treatment) :- इस बीमारी का कोई संतोषजनक उपचार नहीं है। लेकिन निम्न प्रकार उपचार देने पर पक्षियों को कुछ फायदा होता है।


1. रोग की साधारण अवस्था में उस पर पड़ी पपड़ियों को खुरच कर हटा देने से पशु को तनाव से कुछ मुक्ति मिलती है। लेकिन तीव्र रोग होने पर पपड़ियों को खुरचना हानिकारक सिद्ध हो सकता है।


2. घाव पर सिल्वर नाइट्रेट तथा पिकरिक अम्ल का घोल लगाना चाहिए। 

3. शरीर पर कार्बोलेटिक वैसलीन 10% लगाना चाहिए। लेकिन आंख एवं मुंह पर प्रभाव होने पर‌ उपरोक्त उपचार प्रायः नहीं करते हैं। ऐसे स्थानों पर ग्लिसरीन का प्रयोग करते हैं।



रोकथाम (Prevention and control) :- चेचक रोग एक बार शुरु हो जाता है तो फिर उसकी रोकथाम नहीं कर सकते हैं। रोकथाम का एकमात्र उपाय रोग रोधी चेचक के टीके लगाना है चेचक को रोकने के 2 किस्म के टीके लगाते हैं।

1. पिजियन पाॅक्स वैक्सीन - इसके लगाने से चुजो की सुरक्षा होती है। और इसका असर केवल तीन महीने तक ही रह पाता है।

2. फाउल पाॅक्स वैक्सीन :- इसके लगाने से पक्षियों को इस रोग से आजीवन सुरक्षा रहती है।


फाउल पाॅक्स वैक्सीन का टीकाकरण गर्मी प्रारंभ होने से पहले ही कर देते हैं। इस वैक्सीन में ग्लिसरीन या नमक का पानी टीका लगाने से ठीक पहले ही मिलाना चाहिए। चूजों के देने में कई बार सुई चुभो कर दवा को शरीर में प्रवेश कराते हैं। बची रह गई वैक्सीन को जला दें तथा खाली शीशी को सुरक्षित स्थान पर फेंक दे। एक दड़बे की सभी मुर्गियों को एक साथ टीके लगाए। क्योंकि टीका लगी मुर्गियों से उसी दड़बे की बिना टीका लगी मुर्गियों में यह रोग फैल सकता है। 


जब चेचक का खतरा हो तो 1 माह से कम उम्र के चुनाव में एक अंडा देने वाले मुर्गियों में पिजियन पॉक्स वैक्सीन का टीका लगाना चाहिए। बाकी पक्षियों में फाउल पॉक्स वैक्सीन का टीका लगाते हैं। गर्मियों में पैदा हुए बच्चे कमजोर होते हैं। इसलिए उन्हें पहले पिजियन पॉक्स वैक्सीन तथा बाद में फाउल पॉक्स वैक्सीन का टीका लगाना चाहिए। यह टीकाकरण 6 से 8 सप्ताह की आयु के चीजों में करना सबसे अच्छा रहता है।