गेंदा (Marigold )
वानस्पतिक नाम - टेजेटिस इरेक्टा (Tagetes erecta L. )
टेजेटिस पटुला (Tagetes patula L.)
कुल एसटिरेसी (Asteraceae)
उत्पति - मेक्सिको
गेंदा या हजारा एक महत्वपूर्ण व्यावसायिक मौसमी फूल है। इसकी सुंदरता एवं टिकाऊपन के कारण पुष्प व्यापार में गुलाब के बाद सर्वाधिक बिकने वाला पुष्प है। इसके फूल विभिन्न आकार एवं रंगो में वर्षभर उपलब्ध रहते हैं। गेंदा का विभिन्न रूपों जैसे माला, वेणी, झालर, घर की सजावट, पूजा, गुलदस्ता बनाने जैसे अन्य कार्यों में उपयोग व्यापक रूप से किया जाता है।
बौने किस्म का गेंदा, गृह वाटिका, अलंकृत उद्यान, राॅकरी, लटकन, टोकरी आदि के लिए उपयुक्त है। गेंदा के फूल पौधों पर लंबे समय तक खिलते रहते हैं साथ ही इनकी संग्रहण क्षमता अधिक होने के कारण आसानी से कुछ दिनों तक रखे जा सकते हैं। टमाटर, बैंगन, मिर्च आदि सब्जियां जिनमें सूत्रकर्मी का प्रकोप अधिक होता है, गेंदे को मिश्रित खेती के रूप में लगातार इसका नियंत्रण किया जा सकता है।
जलवायु - गेंदा को साल भर तीनों ही ऋतुओं में आसानी से उगाया जा सकता है इसकी अच्छी पैदावार के लिए शरद ऋतु उपयुक्त पाई गई हैं। पौधों में अच्छी बढ़वार व अधिक पुष्पन के लिए नम जलवायु की आवश्यकता होती है।
अधिक तापमान पौधे की वृद्धि एवं पुष्पन को प्रभावित करता है। अधिक ठंड एवं पाला भी पौधों को नुकसान करता है तथा फूलों पर कालापन भी दिखाई देता है।
भूमि व तैयारी - गेंदा विभिन्न प्रकार की भूमियों में लगातार उगाया जा सकता है, परंतु अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट भूमि इसकी खेती के लिए सबसे उपयुक्त रहती है। अधिक क्षारीय व अधिक अम्लीय भूमि पौधों की वृद्धि व पुष्प उत्पादन पर प्रतिकुल प्रभाव डालती हैं । खेती की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करके, भूमि को तेज धूप में कुछ समय के लिए खुला छोड़ देते हैं। बाद में देसी हल से जुताई कर खेत को समतल बनाकर सुविधा अनुसार क्यारियां बना ली जाती है।
जातियां - गेंदा मुख्यतः दो प्रकार का होता है-
1. अफ्रीकन गेंदा (Tagetes erecta ) - यह बड़े फूल वाली जाति है, जिसके पौधे अधिक ऊंचे व फूलों का रंग पीला व नारंगी होता है। यह किस्म व्यावसायिक खेती के लिए महत्वपूर्ण है इस जाति की मुख्य किस्में क्रॉउन ऑफ गोल्ड (पीला), जाॅइन्ट - सनसेट (नारंगी) , स्पन येलो (पीली), स्पन गोल्ड, येलो फलकी, येलो स्टोन, गोल्डन एज, ओरेन्ज हवाई आदि हैं।
2. फ़्रेंच गेंदा (Tagetes patula) - इसके पौधे अधिकतर छोटे, बौने तथा छोटे पुष्प जो कि पीले, नारंगी, सुनहरी लाल, एवं मिश्रित रंग के होते हैं। इसकी किस्में रेड ब्राकेट, बटर स्काॅच, गोल्डी रस्टी रेड़, लेमन जेम, स्कारलेट ग्लो, लेमन ड्राॅप, रेड चेरी, बोनन्जा फ्लेम, सोफिया आदि हैं। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, नई दिल्ली द्वारा अफ्रीकी गेंदे की दो किस्में पूसा नारंगी एवं पूसा बसंती विकसित की है, जिनके फूल काफी आकर्षक होते हैं।
प्रवर्धन - आमतौर पर गेंदा को बीज द्वारा ही उगाया जाता है बीजों को पौधशाला में ऊंची उठी हुई क्यारियों में समान रूप से बिखेर कर बुवाई करें। 3 से 4 सप्ताह बाद पौध रोपाई के लिए तैयार हो जाती है। एक हेक्टेयर की बुवाई के लिए लगभग सवा किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है। इसके बीजों की अंकुरण क्षमता वर्ष भर तक अधिक रहती है तथा इससे अधिक पुराना बीज नहीं होना चाहिए क्योंकि उसकी उसकी अंकुरण क्षमता घट जाती है।
रोपाई - गेंदे की रोपाई क्यारियों में करें। अफ्रीकन गेंदें की रोपाई कतार से कतार 45 से 60 सेन्टीमीटर व पौध से पौध 30 से 45 सेन्टीमीटर की दूरी पर करें।
सिंचाई एवं निराई गुड़ाई - गेंदे को कम पानी की आवश्यकता रहती है। अतः गर्मियों में 7 दिन व सर्दी में 12 से 15 दिन के अंतर पर सिंचाई करना चाहिए। चौपाई के 25 दिन बाद खेत में एक हल की निराई गुड़ाई भी करनी चाहिए। बुराई करते समय पौधों के पास मिट्टी चढ़ाना चाहिए। अफ्रीकन गेंदे के पौधे हवा से जमीन पर नहीं गिरे, इसके लिए लकड़ी का सहारा भी लगाया जा सकता है। फूलों की अच्छी पैदावार के लिए 200 से 300 पीपीएम जिब्रेलिक एसिड का पौधों पर कॉल आने से पहले छिड़काव करना चाहिए।
गेंदा में पौधरोपण के 40 दिन बाद पिंचिंग करने से पौधे में शाखाएं जल्दी व अधिक संख्या में बनती है जिससे फूल भी अधिक प्राप्त होते हैं।
प्रमुख कीट - मोयला, सफेद मक्खी, हरा तेला - ये कीट पौधों की पत्तियों एवं कोमल शाखाओ से रस चुस कर कमजोर कर देते हैं। इससे उपज पर प्रतिकुल प्रभाव पड़ता हैं। इसके नियंत्रण हेतु मिथाइल डिमेटोन 25 ई.सी. अथवा डाइमिथोएट 30 ई. सी. एक मिली लीटर पानी में घोल बनाकर छिड़काव करें।
प्रमुख व्याधियां - चूर्णिल आसिता - इस रोग के प्रकोप से पतियों एवं कलियों पर सफेद चूर्णी धब्बे दिखाई देते हैं। नियंत्रण हेतु कैराथियान/ केलक्सिन 1 मिली प्रति लीटर पानी के घोल का छिड़काव 15 दिन के अन्तराल पर करें ।
फूलों की तुड़ाई एवं उपज - पौध रोपाई के 60-70 दिन बाद फूल तोड़ने लायक हो जाते हैं और औसतन उपज 80-100 क्विंटल प्रति हेक्टेयर मिलती है जबकि अफ्रीकन गेंदें की उपज 180-200 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक मिल सकती हैं।


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