मूली (Raddish)
वानस्पतिक नाम : रेफनस सेटाइवस एल. (Raphanus sativus L.)
कुल : ब्रेसिकेसी (Brassicaceae)
मूली ब्रेसिकेसी कुल की जड़वाली सब्जी है। यह शीतलता प्रदान करने वाली (ठंडी तासीर), कब्ज दूर करने वाली, भूख बढ़ाने वाली सब्जी है। जिसका उपयोग सलाद, अचार तथा केण्डी बना कर किया जाता है। बवासीर, पीलिया और जिगर की बीमारी में इसका उपयोग अत्यधिक लाभदायक है। मूली में विटामिन 'ए' और 'सी' तथा खनिज लवण, फास्फोरस प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं। यह शीघ्र तैयार होने वाली फसल है। इसकी जड़ों में गंधक, कैल्शियम तथा फास्फोरस मुख्य रूप से होता है।
जलवायु (Climate) - मूली मुख्य रूप से ठंडे मौसम की फसल है परंतु एशियाई किस्में यूरोपियन किस्मों की अपेक्षा अधिक गर्मी सहन कर सकती है। ज्यादा तापमान होने पर मूली की जड़े कठोर तथा चरपरी हो जाती है। सर्वोत्तम गंधक, स्वाद एवं संरचना के लिए 12-15 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान उत्तम माना गया है।
मृदा एवं खेत की तैयारी ( Soil and field preparation ) - मूली की सफल खेती के लिए जीवांश युक्त, अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी सर्वोत्तम होती है। भारी मिट्टी के लिए अनुपयुक्त मानी जाती है। क्योंकि उसमें जड़ो का पूर्ण विकास नहीं हो पाता है। मूली के लिए भुरभुरी मिट्टी की आवश्यकता होती है। इसके लिए 1 जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से तथा 2-3 जुताई देशी हल से करें। जुताई के बाद पाटा अवश्य लगाएं।
बुआई, बीज की मात्रा एवं उपचार (Sowing, seed rate and seed treatment ) - उत्तर भारत के मैदानी क्षेत्रों में एशियाई मूली बोने का मुख्य समय सितंबर से फरवरी तथा यूरोपियन किस्मों की बुवाई अक्टूबर से जनवरी तक करते हैं।
एशियाई किस्मों की 6 - 8 किलोग्राम और यूरोपियन किस्मों की 8-10 किग्रा. प्रति हेक्टेयर बीज की आवश्यकता होती है। बीज बोने से पूर्व उनका कैप्टान तथा थायरम 2 ग्राम प्रति किलो बीज दर से उपचार करें।
बुवाई के समय खेत में नमी अच्छी प्रकार होनी चाहिए।
खेत में नमी की कमी होने पर पलेवा करके के तैयार करते हैं। इसकी बुवाई या तो छोटी-छोटी समतल क्यारियों में या 30 से 45 सेंटीमीटर की दूरी पर बनी मेड़ों पर करते हैं।
उन्नत किस्में (Improved varieties) :
यूरोपियन किस्में - व्हाइट इसीकिल, रेपिड रेड व्हाइट
एशियाई किस्में - जापानी व्हाइट, पूसा हिमानी, पूसा चेतकी, पूसा देशी, पूसा रेशमी, पंजाब सफेद, अर्का निशान्त।
खाद एवं उर्वरक (Manure and fertilizer ) - मूली शीघ्र तैयार होने वाली फसल हैं। भूमि में पर्याप्त मात्रा में खाद व उर्वरक होना चाहिए। अच्छी पैदावार के लिए एक हेक्टेयर खेत में 20-25 टन अच्छी प्रकार सड़ी हुई गोबर की खाद या कंपोस्ट बुआई से 25-30 दिन पूर्व प्रारंभिक जुताई के समय खेत में मिला दे इसके अतिरिक्त 30 किग्रा. नाइट्रोजन, 45 किग्रा. फास्फोरस और 45 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर की आवश्यकता पड़ती है। नत्रजन की आधी मात्रा व फास्फोरस और पोटाश की पूरी मात्रा हुआ इसके पहले खेत में डाल दें। शेष आधी नत्रजन की मात्रा बुवाई के 20 दिन बाद शीतोष्ण किस्मों में और 25-30 दिन बाद एशियाई किस्मों में टॉप ड्रेसिंग के रूप में दें।
सिंचाई (Irrigation) - वर्षा ऋतु की फसल में सिंचाई की आवश्यकता नहीं पड़ती है परंतु गर्मी की फसल के 4-5 दिन के अंतर पर सिंचाई अवश्य करते रहना चाहिए। शरदकालीन फसल में 10-15 दिन के अंतर पर सिंचाई करते हैं।
निराई - गुडाई (Interculture operations ) - प्रभावी खरपतवार नियंत्रण के लिए मूली के खेत में 2-3 निराई गुड़ाई करें। जड़ बनते समय उन पर एक बार मिट्टी अवश्य चढ़ा दे।
प्रमुख कीट एवं व्याधियां (Important insect pests and disease ) - मूली की फसल को माहू, सरसों की आरा मक्खी तथा पती काटने वाले सूंडी काफी हानि पहुंचाती है।
मैलाथियान 50 ईसी को 1.5 मि.ली. प्रति लीटर पानी में घोलकर छिड़काव करना चाहिए।
व्याधियां (Disease) - सफेद रोली :- इस रोग से प्रभावित पतियों की निचली सतह पर धब्बे दिखने लगते हैं। इसकी रोकथाम हेतु मैंकोजेब का 2 ग्राम प्रति लीटर पानी की दर से छिड़काव करें।
खुदाई एवं उपज (Harvesting and yield ) - मूली को हमेशा नरम और मुलायम अवस्था में उखाड़ना या खोदना चाहिए। मूली की खुदाई एक तरफ से न करके तैयार जड़ों को छांट कर करें। पूसा चेतकी किस्म की जड़े 40-45 दिन में तैयार हो जाती हैं। उचित देखभाल में यूरोपियन किस्म की 80-100 क्विंटल तथा एशियाई किस्म की 200-250 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त हो जाती हैं।

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