मिर्च (Chilli)
वानस्पतिक नाम : कैप्सिकम एनम् एल. एवं कैप्सिकम फ्रूटेसेन्स एल.
(Capsicum annum L. and Capsicum frutescens L. )
Capsicum annum var. Longumमिर्च का उपयोग कच्चा सलाद के रूप में, अचार बनाकर, पकी लाल मिर्च को सुखाकर मसाले की तरह हरी - मीठी मिर्च को सब्जी के लिए प्रयोग में लाते हैं। इसकी खेती संपूर्ण भारत में की जाती है। परंतु दक्षिणी राज्यों में यह बहुतायत से उगाई जाती हैं इसके फलों में तीखापन "केप्सेसिन" के कारण होता है। मिर्च में विटामिन "ए" तथा "सी", फास्फोरस तथा कैल्शियम प्रमुखता से पाए जाते हैं इसका फल तेज स्वाद वाला रक्तवर्धक, पीडानाशक, दर्द और सूजन दूर करता है।
जलवायु (Climate):- टमाटर व बैंगन के समान मिर्च के लिए भी गर्म जलवायु सबसे अच्छी रहती है। इसे उष्ण तथा उपोष्ण भागों में सफलतापूर्वक उगाया जाता है। फल बनने के लिए उपयुक्त तापमान 24 डिग्री सेंटीग्रेड हैं। उच्च तीव्रता वाले प्रकाश में फलों की उपज तो बढ़ती है परंतु केप्सेसिन की मात्रा घटती है। साथ ही रंग के विकास में काफी देरी होती है। शिमला मिर्च के लिए अपेक्षाकृत ठंडा मौसम अनुकूल रहता है।
मृदा एवं खेत की तैयारी (Soil and field preparation):
अच्छे जल निकास वाली बलुई दोमट मिट्टी इसके लिए उपयुक्त मानी जाती है। इसके लिए भूमि का पीएच मान 6 से 7.5 होना चाहिए। अधिक लवण एवं क्षार वाली मृदा मिर्च के लिए उपयुक्त नहीं हैं। इससे बीज अंकुरण हो तथा पादप ओज पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। रोपाई पूर्व खेत में 5 से 6 जुताइयाॅ करके एक बार पाटा लगाकर भूमि को समतल कर लेना चाहिए।
बुआई का समय एवं बीज की मात्रा (Time of sowing and seed rate) - मिर्च की वर्ष में 3 फसले ली जा सकती है लेकिन प्रायः इसकी फसल खरीफ एवं गर्मी में ली जाती है।
पहले पौधशाला में बीज की बुवाई कर हो तैयार की जाती है। इसके लिए खरीफ की फसल हेतु मई-जून में और गर्मी की फसल हेतु फरवरी-मार्च में नर्सरी में बीज की बुवाई करें। बीजों की बुवाई से पूर्व 2 ग्राम कैप्टान या बाविस्टिन 2 ग्राम प्रति किग्रा बीज की दर से उपचारित करें जिससे बीज जनित रोगों का प्रकोप ना हो सके। एक हेक्टेयर खेत में मिर्च की खेती के लिए 1 -1.5 किग्रा बीज की आवश्यकता होती है।
उन्नत किस्में (Improved varieties) :- मिर्च की किस्मों को दो वर्गों में बांटा जा सकता हैं।
मसाले वाली - पूसा ज्वाला, पंत सी -1, कल्याणपुर टाईप 1, कल्याणपुर मोहिनी, पूसा सदाबहार ( निर्यात हेतु बहुवर्षीय) , जवाहर मिर्च 128, अग्नि, डी.
सी.एच. 1, एनपी 46 ए, हंगेरियन वैक्स (पीले रंग वाली),
शिमला मिर्च ( सब्जी वाली ) - कैलीफोर्निया वण्डर, रूबी किंग, बुलनोज, यलो वण्डर, चायनीज जाइण्ट, सेलेक्शन 27, अर्का मोहिनी।
खाद एवं उर्वरक (Manure and fertilizer ) - मिर्च की पैदावार उसने प्रयुक्त खाद एवं उर्वरकों की मात्रा व किस्म पर निर्भर करती है। अच्छी उपज के लिए 25 - 30 टन प्रति हेक्टेयर सड़ी गोबर की खाद खेत की तैयारी के समय खेत में मिलावें तथा तत्व के रूप में 70 - 80 कि.ग्रा. नत्रजन, 40 - 50 किग्रा फास्फोरस तथा 40 - 50 किग्रा पोटाश प्रति हेक्टेयर की दर से प्रयोग करना चाहिए। नाइट्रोजन की आधी व फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा रोपण से पहले दे तथा शेष नाइट्रोजन को दो भागों में बांट कर रोपण से 25 व 45 दिनों बाद खड़ी फसल में डालें।
सिंचाई (Irrigation) : पौधे रोपण के तुरंत बाद हल्की सिंचाई करना अत्यंत आवश्यक है। उसके बाद आवश्यकतानुसार सिंचाई करना चाहिए। मिर्च में भूमि तथा ऋतु के अनुसार सिंचाई की आवश्यकता होती है यदि वर्षा कम हो रही हो तो 10 - 15 दिनों के अंतराल पर सिंचाई करनी चाहिए। गर्मी के महीनों में सिंचाई एक सप्ताह के अंतराल पर करें।
निराई - गुड़ाई (Interculture operations) : मिर्च की फसल से अच्छी से अच्छी पैदावार प्राप्त करने के लिए खेत में समय-समय पर निराई गुड़ाई करते रहना चाहिए। प्रत्येक सिंचाई के बाद खेत में हल्की गुड़ाई करनी चाहिए ताकि सिंचाई के समय बनी हुई मिट्टी की पपड़ी टूट जाए। यदि पौधा अधिक भारी नजर आए तो पौधों पर मिट्टी चढ़ाकर सहारा दे।
प्रमुख कीट एवं व्याधियां ( important insect pests and disease) :-
1. हरा तेला ( Jassid), मोयला (Aphids) व सफेद मक्खी (white fly) - ये कीट पतियों के नीचे या कोमल भागों का रस चूसकर पौधों को कमजोर बना देते हैं।
रोकथाम :- डाईमिथोएट 30 ई सी 1 मिली / लीटर या मेलाथियान 50 ईसी 2 मिली / प्रति लीटर या मिथाइल डिमेटोन 25 ई सी 1 मिली / लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
2. लाल माइट (Red mite) :- यह छोटा सा की पत्तियों का रस चूस कर उन्हें कमजोर बना देता है। पत्तियां पीली पड़कर गिरने लगती हैं।
रोकथाम:- डाईमिथोएट 30 ई सी 1 मिली / लीटर या मेलाथियान 50 ईसी 2 मिली / प्रति लीटर या मिथाइल डिमेटोन 25 ई सी 1 मिली / लीटर पानी के हिसाब से छिड़काव करें।
व्याधियां ( Disease ) :-
1. आर्द्र गलन (Damping off) - यह रोग नर्सरी में होता हैं तथा इसके कारण छोटे पौधें मर जाते हैं।
रोकथाम - 1. बीज बोने से पूर्व उन्हें एग्रोसोन जी.एन. या सेरेसान से उपचारित करें।
2. फार्मेलिन 0.2% से नर्सरी की भूमि उपचारित करें।
3. नर्सरी, आस-पास की भूमि से 4 से 6 इंच उठी हुई भूमि में बनायें।
2. मोजैक (Mosaic) - इस रोग से प्रभावित पौधों की पत्तियां सिकुड़ कर छोटी हो जाती है। तथा तना भी छोटा हो जाता है। पतियां पीली पड़ जाती है।
रोकथाम:- 1. रोगग्रस्त पौधों को उखाड़कर जला दे।
2. रोगी रोधी किस्में जैसे पूसा सदाबहार, पूसा ज्वाला, पंत सी-1 व 2 को उगाएं।
3. मेलाथियान 50 ई.सी. का 1 मिली प्रति लीटर का घोल बनाकर 10- 15 दिन के अन्तराल पर छिड़काव करें।
3. मुरझान (Wilt) - इस रोग से ग्रस्त पौधा अचानक सूख जाता हैं।
रोकथाम - 1. उचित फसल चक्र अपनायें।
2. ताम्र युक्त दवाओं का प्रयोग करें।
4. पर्ण संकुचन रोग (Leaf curl ) - रोगग्रस्त पौधे की पतियां छोटी होकर मुड़ जाती हैं, पौधा छोटा रह जाता है व शीर्ष पर गुच्छा बन जाता हैं।
रोकथाम -
1. एफिड नियंत्रण करें।
2. डाईमिथोएट 30 ईसी 1 मि ली / लीटर का छिड़काव करें।
3. प्रभावित पौधों को उखाड़कर जला दे।
तुड़ाई व उपज (Harvesting and yield ) :- हरी मिर्च की तुड़ाई फल लगने के 15 - 20 दिन बाद कर सकते हैं। यदि सूखी लाल मिर्च के लिए तुड़ाई करनी हो तो एक या दो बार हरी मिर्च की तुड़ाई करकें मिर्च पौधे पर ही पकने के लिए छोड़ दी जाती हैं इससे फूल बहुलता से आते है। हरी मिर्च की 100 -150। क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज प्राप्त की जा सकती हैं।


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