वर्गीकरण -
संघ - एनिमिया
उप साम्राज्य - इनवर्टेब्रेटा
फाइलम - आर्थोपोडा
वर्ग - कीट
सामान्य नाम - रेशम कीट
सेरीकल्चर क्या है - सेरीकल्चर या रेशम कीट पालन रेशम का पालन हैं। इसके तहत रेेेेशम कीट का पालन किया जाता है। जिससे कि सिल्क का उत्पादन किया जा इसके रेशम कीट उत्पादन एक कला और विज्ञान दोनों का समावेश है जिसके द्वारा सिल्क केे धागों का उत्पादन किया जाता है।
और उससे सुंदर वस्त्रों का निर्माण किया जाता है। अगर हम देखे कि रेशम के कीट की विभिन्न प्रजातियां रेशम उत्पादन में सहायक होती है परंतु बाॅम्बिक्स मोराई रेशम कीट की प्रजाति है उसका सर्वाधिक उपयोग किया जाता है। रेशम को वस्त्रों की रानी भी कहा जाता है साथ ही इसको जैव स्टील या बायोस्टील भी कहा जाता है।
मोरीकल्चर क्या है - मोरीकल्चर यह शहतुत उत्पादन एक विज्ञान की शाखा है जिसके तहत सिल्क उत्पादन के लिए शहतूत के पौधों का उत्पादन किया जाता है। क्योंकि जो शहतूत के पत्ते बॉम्बैक्स मोराई का मुख्य भोजन होता है किंतु इसके साथ ही साथ ओसेज, नारंगी तथा सलाद के पत्तों को भी भोजन के रूप में समावेश कर सकता है।
सेरीकल्चर - रेशम कीट उत्पादन के लिए जो सेरीकल्चर शब्द का उपयोग किया जाता है जो ग्रीक भाषा के
सेरीकोस शब्द से लिया गया है। सेरीकोस शब्द स्वयं दो शब्दों से मिलकर बना होता हैं। जिसमें प्रथम शब्द सेरी जिसका अर्थ - रेशम और दुसरा कोस जिसका अर्थ उत्पादन होता हैं सिल्क उत्पादन की जो प्रक्रिया है उसे रेशम उत्पादन कहा जाता है। वास्तव में सिल्क का उत्पादन औद्योगिक स्तर पर उत्पन्न करने की जो प्रक्रिया है उसे ही रेशम कीट उत्पादन का नाम दिया गया है। रेशम कीट की लार ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित किया जाने वाला लार है जो एक फाइबरिस प्रोटीन होता है सिल्क के जो तंतु होते हैं वो मुख्य रुप से दो प्रकार के प्रोटीन के द्वारा निर्मित होते हैं
1. फाइब्रोइन
2. सेरीसीन
रेशम का इतिहास - एक चाइनीज कथा के तहत यह कहा जाता हैं रेशम कीट उत्पादन जब शुरू हुआ वो एक आकस्मिक घटना के कारण शुरू हुआ एक बार राजा की रानी एक पेड़ के नीचे बैठकर चाय पी रहीं थी तभी उसके कप में एक रेशम का कोकून गिर गया। क्योंकि उस गर्म चाय में गिरने के कारण रेशम के कोकून के धागे अलग अलग हो गए। उसने कोकून को बाहर निकाला और उसके धागों को अपनी अंगुलियों के चारों तरफ लपेटना शुरू कर दिया । धीरे धीरे लपेटते हुए उसने यह महसूस किया कि उसे गर्माहट का अहसास हो रहा हैं जब कोकून में से पूरा सिल्क समाप्त हो गया। उसने देखा अन्दर एक छोटा सा लारवा था उसे अनुभव हुआ कि शायद यही केटरपिलर का लार्वा सिल्क उत्पादन का मुख्य स्त्रोत होगा। तब उसने बाकी लोगों को भी सिल्क के बारे में बताया तब सिल्क उत्पादन की प्रक्रिया सम्पूर्ण विश्व में फैलने लगी।
भारत में सेरीकल्चर का इतिहास -
- ऐसा माना जाता है कि आर्यों के द्वारा सिल्क उत्पादन की प्रक्रिया हिमालयी क्षेत्रों में प्रारंभ की गई थी।
- कश्मीर से लेकर बंगाल तक का सिल्क फाउन्डेशन प्रारंभ किया जिसकी वजह से कर्नाटक हमारे देश का 70% उत्पादन करता हैं
- सन् 1717 - 1775 तक थ इंडिया कंपनी के द्वारा इटली के विधि द्वारा इटली के विधि द्वारा सिल्क उत्पादन किया जाता हैं।
- Silk Expansion scheme - के तहत जिसके द्वारा रेशम के उत्पादन को पैराशूट का कपड़ा निर्मित करने के लिए कैसे उपयोग में लिया जा सकेंगे।
- सन् 1950 में भारत भारत में केन्द्रीय रेशम बोर्ड की स्थापना की गई।
- सन् 1963 में भारत में CSTRI ( Central sericulture training and research institute) मैसूर में स्थापना की थी।
-1964 में टसर रिसर्च स्टेशन की स्थापना हुई।
रेशम कीट का सामान्य जीवन चक्र -
- रेशम के कीट से रेशम प्राप्त होता हैं और इस रेशम कीट से मुलायम चिकने कपड़े बनाएं जातें हैं।
- यह कीट शहतूत के पत्तों पर रहता है शहतुत की पत्तियों को खाता है।
- रेशम कीट का पालन पोषण और रेशम बनाने की क्रिया रेशम कीट पालन / सेरीकल्चर कहलाती हैं
रेशम कीट से रेशम कैसे प्राप्त किया जाता हैं -
- रेशम के कीट शहतूत की पत्तियों पर लगभग 300 - 4
00 अण्डो का रोपण करती है
- रेशम के कीट शहतूत की पत्तियों पर अण्डे देते हैं
- प्रत्येक अण्डे से लगभग 10 दिन में एक नन्हा सा कैटरपिलर लार्वा निकलता है।
- यह कीट तितली के केटरपिलर से मैच करता है और शहतुत की पत्तियों को खाकर तेजी से बड़ा होता हैं।
- लार्वा लगभग 30 - 40 दिन में सक्रिय वृद्धि के फलस्वरूप , पहले लंबा होता हैं फिर सुस्ते होकर गोल हो जाता हैं ।
- गोल एवं छोटा होने के बाद, अब तीन दिन तक यह केटरपिलर अपने सिर को दाये - बाये हिलाकर अपने चारों ओर लार ग्रंथियों द्वारा स्त्रावित पदार्थ से एक ही लंबे धागे का खोल बना लेता है। जिसे कोया या कोकून कहते हैं।
- अब जैसे ही यह कोकून वायु के सम्पर्क में आता है तो सुखकर रेशमी धागा बन जाता हैं जो लगभग 1000 m लंबा होता हैं
- अब, कोकून के अंदर बंद लार्वा अब एक प्युपा में रुपांतरित हों जाता हैं।
- साधारणतः 12 -15 दिन में प्यूपा कायान्तरण द्वारा पूर्ण कीट में बदल जाता हैं।
- यह पूर्ण कीट क्षारीय स्त्राव की सहायता से कोकून को एक ओर से काटकर बाहर निकल जाता हैं। इससे कोकून का रेशमी धागा अनेक टुकड़ों में टुटकर व्यर्थ हों जाता हैं।
- अतः रेशम प्राप्त करने के लिए पूर्ण कीट को बाहर निकलने से पहले ही कोकून को खोलते , जल में डालकर पूर्ण कीट को भीतर ही भीतर मार देते हैं और धागे को अलग - अलग कर लेते हैं।
इस प्रकार से रेशम के कीट से रेशम प्राप्त होता हैं।




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